नए एंटीमाइक्रोबियल मॉलिक्यूल खोजने के लिए एक रिसर्चर Codex और ChatGPT का इस्तेमाल कैसे करता है
सीज़र डे ला फुएंते और उनकी लैब जीवित और विलुप्त जीवों के जीनोम की जाँच कर रहे हैं, ताकि ऐसे मॉलिक्यूल मिल सकें जो ड्रग-रेज़िस्टेंट इन्फ़ेक्शन से लड़ने में मदद कर सकें.
बैक्टीरिया, फ़ंगस, पैरासाइट और वायरस जैसे ड्रग-रेज़िस्टेंट माइक्रोब्स दुनिया भर में एक बढ़ता हुआ ख़तरा हैं. 2021 में लगभग पाँच मिलियन मौतें बैक्टीरियल एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस से जुड़ी(एक नई विंडो में खुलेगा) थीं—यह सालाना संख्या 2050 तक लगभग दोगुनी होने का अनुमान है. एंटीमाइक्रोबियल बनने की क्षमता वाले मॉलिक्यूल को खोजने में सालों लग सकते हैं. रिसर्चर इस शुरुआती खोज को तेज़ करने के लिए AI का इस्तेमाल कर रहे हैं.
बायोइंजीनियर सीज़र डे ला फुएंते(एक नई विंडो में खुलेगा), जिनकी क्रॉस-डिसिप्लिनरी लैब एंटीमाइक्रोबियल कैंडिडेट की खोज करती है, ने कहा, “मेरी राय में, एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस इंसानियत के लिए सबसे बड़े ख़तरों में से एक है.” “और फिर भी, पिछले 50 सालों से एंटीबायोटिक्स की कोई नई क्लास नहीं आई है.”
मॉडर्न एंटीमाइक्रोबियल डेवलपमेंट का ज़्यादातर फ़ोकस मौजूदा दवाओं को बदलने या जाने-पहचाने केमिकल ग्रुप की खोज पर होता है. लेकिन इस तरीके से मिलने वाले नतीजे कम होते जा रहे हैं.
डे ला फुएंते की लैब एक ऐसी जगह से काम शुरू करती है जिस पर बहुत कम रिसर्च हुई है: जीवन का कोड. इस काम के पीछे मुख्य विचार यह है कि बायोलॉजी एक सूचना सिस्टम है. डे ला फुएंते ने कहा, "DNA बनाने वाले न्यूक्लियोटाइड्स और प्रोटीन व पेप्टाइड्स बनाने वाले अमीनो एसिड्स एक तरह से वर्णमाला की तरह होते हैं." "बायोलॉजी को सूचना के तौर पर देखने से हमें ऐसे तरीके विकसित करने में मदद मिली, जिनसे हम जीवन के उन बुनियादी सिद्धांतों को समझना शुरू कर सके, जिनकी वजह से एक काम करने वाला मॉलिक्यूल बना."
लैब के डीप-लर्निंग मॉडल को बायोलॉजिकल सीक्वेंस में पैटर्न पहचानने के लिए ट्रेन किया जाता है, जिससे वे संभावित एंटीमाइक्रोबियल की खोज के लिए विशाल जीनोम और प्रोटीन डेटासेट को सर्च कर सकते हैं. यह तरीका संभावित मॉलिक्यूल की शुरुआती खोज में लगने वाले समय को सालों से घटाकर घंटों में ला सकता है.
अपने AI मॉडल के साथ-साथ, लैब ChatGPT और Codex का इस्तेमाल हाइपोथीसिस पर सोचने, कोड लिखने और उसे बेहतर बनाने, डेटासेट को प्रोसेस करने, नतीजों को एनालाइज़ करने और अलग-अलग वैज्ञानिक विषयों में आइडिया को जोड़ने के लिए करती है.
जीनोम के बहुत छोटे हिस्से का ही काम ठीक से समझा जा सका है, और उससे भी कम हिस्से ऐसे मॉलिक्यूल होते हैं जो इन्फ़ेक्शन फैलाने वाले माइक्रोब्स से लड़ सकते हैं. चुनौती यह है कि ऐसे पैटर्न की पहचान की जाए जो किसी मॉलिक्यूल को काम करने लायक या बायोलॉजिकली एक्टिव बनाते हैं, फिर यह तय किया जाए कि उनमें से किनमें इन्फ़ेक्शन फैलाने वाले माइक्रोब्स से लड़ने की क्षमता है.
वैज्ञानिक लंबे समय से पौधों, जानवरों, माइक्रोब्स, कीड़ों, पानी और मिट्टी में एंटीमाइक्रोबियल्स की खोज कर रहे हैं. वे सैंपल इकट्ठा करते हैं, कैंडिडेट मॉलिक्यूल्स को अलग करते हैं या उनका अनुमान लगाते हैं, और उन्हें एक बार-बार होने वाले प्रोसेस में टेस्ट करते हैं जिसमें सालों लग सकते हैं.
डिजिटल जीनोम और प्रोटीन डेटाबेस की वजह से अब वैज्ञानिक नए कंपाउंड्स की खोज के जीवों के विकास-क्रम में छानबीन कर सकते हैं, जिससे खोज के लिए उपलब्ध डेटाबेस का दायरा बहुत बढ़ गया है. लेकिन जानकारी की इस भरमार के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं: जैसे कि इतनी सारी संभावनाओं के बीच काम के संकेत ढूँढ़ना.
AI इस तरह के मुश्किल काम के लिए बहुत उपयुक्त है. यह बड़े डेटासेट को स्कैन कर सकता है, ऐसे पैटर्न की पहचान कर सकता है जिन्हें रिसर्चर शायद न देख पाएँ, और एक्सपेरिमेंटल टेस्टिंग के लिए उम्मीदवारों के एक ऐसे सेट को प्राथमिकता दे सकता है जिसे आसानी से संभाला जा सके.
लेकिन किसी उम्मीदवार विकल्प की पहचान होने का मतलब यह ज़रूरी नहीं कि वह एक असरदार दवा बन ही जाएगा.
वैज्ञानिकों को सबसे पहले यह पक्का करना होगा कि कोई संभावित मॉलिक्यूल टारगेट माइक्रोब को ख़त्म करता है, असरदार होने के लिए उसकी कितनी मात्रा चाहिए, और यह इंसानी सेल्स पर कैसा असर डालता है. इसके बाद, केमिस्ट इसकी असरदार क्षमता, सुरक्षा या स्थिरता को बेहतर बनाने के लिए इसमें सुधार कर सकते हैं.
आगे के टेस्ट में यह पता लगाया जाता है कि किस डोज़ पर कैंडिडेट टॉक्सिक हो जाता है, कितनी आसानी से माइक्रोब्स उस मॉलिक्यूल के प्रति रेज़िस्टेंस डेवलप कर लेते हैं, और कैंडिडेट शरीर में कैसे आगे बढ़ता है. टीम उस मॉलिक्यूल को बनाने का एक भरोसेमंद तरीका भी तय करती हैं. जो कैंडिडेट इन मुश्किलों को पार कर लेते हैं, उन्हें मरीज़ों तक मंज़ूर किए गए एंटीमाइक्रोबियल दवा के तौर पर पहुँचने से पहले रेगुलेटरी रिव्यू और क्लिनिकल ट्रायल से गुज़रना पड़ता है.
डे ला फुएंते के अनुसार, यही वजह है कि AI और लैबोरेटरी बायोलॉजी को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा, "AI के अनुमानों को सही साबित करने के लिए 'ग्राउंड-ट्रुथ' एक्सपेरिमेंट बहुत ज़रूरी हैं." "आने वाले सालों में लाइफ़ साइंसेज़ के क्षेत्र में यह बहुत अहम होगा, क्योंकि हमें बायोलॉजी की अपनी समझ को और गहरा करना है, जो कि सबसे मुश्किल चीज़ है."
उनकी लैब कैंडिडेट मॉलिक्यूल्स के लिए जीवित और विलुप्त हो चुके जीवों के जीनोम की खोज करती है. उन जीनोम को खोजना, यह समझना कि उनके एन्कोडेड प्रोटीन कैसे बनते और काम करते हैं, और यह पता लगाना कि वे मॉलिक्यूल्स क्या करते हैं, इसके लिए कई क्षेत्रों की विशेषज्ञता की ज़रुरत होती है.
डे ला फुएंते ने कहा, “हम एक बहुत ही ट्रांसडिसिप्लिनरी ग्रुप हैं, इसलिए हमारे पास बायोलॉजी, केमिस्ट्री, कंप्यूटर साइंस, इंजीनियरिंग के लोग हैं.” लैब के कुछ सदस्य अच्छे प्रोग्रामर हैं लेकिन उन्हें बायोलॉजी या केमिस्ट्री के बारे में कम जानकारी है और इसका उल्टा भी होता है. Codex और ChatGPT इन कमियों को भरने में मदद करते हैं, जिससे बायोलॉजिस्ट प्रोग्राम बना सकते हैं और प्रोग्रामर बायोलॉजिकल समस्याओं से निपट सकते हैं. इस मायने में, AI वैज्ञानिक विषयों के बीच की रुकावटों को कम करता है.
इससे लैब के सदस्यों को अपने क्रॉस-डिसिप्लिनरी काम के लिए ज़रूरी अनजान विषयों को समझने, शब्दों के अर्थ स्पष्ट करने, अलग-अलग क्षेत्रों के तरीकों की तुलना करने और दवा की खोज के लिए आइडिया को व्यवस्थित करने में मदद मिलती है. दूसरे सदस्य बड़े जीनोम डेटासेट को डाउनलोड, व्यवस्थित और प्री-प्रोसेस करने के लिए AI का इस्तेमाल करते हैं. ChatGPT लैब के सदस्यों को अपनी मातृभाषा में काम करने देता है, जिससे उनके वर्कफ़्लो को तेज़ करने में रुकावटें कम होती हैं.
डे ला फुएंते ChatGPT का इस्तेमाल ब्रेनस्टॉर्मिंग पार्टनर के तौर पर करते हैं. वह अपने साथियों के साथ मिलकर आइडिया पर काम करते रहते हैं, लेकिन उन्हें AI की यह ख़ूबी पसंद है कि वह हाइपोथीसिस को आकार देने में उनकी मदद करता है. उन्हें यह भी अच्छा लगता है कि वह एक बटन दबाकर दुनिया भर की जानकारी हासिल कर सकते हैं.
डे ला फुएंते ने कहा, “हमारे ChatGPT वर्कस्पेस को उन सभी अलग-अलग लोगों से इनपुट मिल रहा है, जो उन समस्याओं के बारे में अलग तरह से सोचते हैं जिन्हें हम हल करने की कोशिश कर रहे हैं.” लैब के सदस्य इसमें अपने अच्छे और बुरे विचार डालते हैं, जिससे यह एक तरह का मिलकर काम करने वाला ज़रिया बन जाता है.
लेकिन वे सिर्फ़ AI पर निर्भर रहने के ख़िलाफ़ चेतावनी देते हैं. डे ला फुएंते ने कहा, "ज़ाहिर है, आपको हमेशा सटीकता की दोबारा जाँच करनी चाहिए."
फिर भी, वे AI की उस क्षमता की तारीफ़ करते हैं जो रिसर्च करने वालों को अलग-अलग वैज्ञानिक विषयों के बीच की सीमाओं को समझने में मदद करती है. "यहीं पर बड़ी खोज होने का इंतज़ार है. असल में, ये खोज अलग-अलग क्षेत्रों के बीच के उन हिस्सों में छिपी होती हैं, जहाँ बहुत कम लोग जाते हैं."
वे इस काम को एक बहुत पुरानी वैज्ञानिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं. डे ला फुएंते ने कहा, "अपने आस-पास की दुनिया को समझने के लिए हम हमेशा से ही टूल्स और मशीनों पर निर्भर रहे हैं. टेलीस्कोप ने ब्रह्मांड को उजागर किया और माइक्रोस्कोप ने उस दुनिया को दिखाया जो दिखाई नहीं देती थी." अब मशीनें रिसर्च करने वालों को बायोलॉजी को समझने, उसका अनुमान लगाने और उसे बनाने में मदद करती हैं. उन्होंने कहा, "हमारा काम यही है."
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