GPT‑5 ने इम्यूनोलॉजिस्ट डेर्या उनुतमाज़ की 3 साल पुरानी पहेली कैसे सुलझाई
इस मॉडल की खूबियों से कैंसर रिसर्च, ऑटोइम्यून बीमारियों और इन्फ़ेक्शन जैसे कई क्षेत्रों में इंसानी क्षमताओं को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
डॉक्टर और इम्यूनोलॉजिस्ट डेर्या उनुतमाज़ कई सालों से आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में दिलचस्पी रखते हैं. लेकिन उनका वो सुनहरा पल 2025 के आखिर में आया, जब GPT‑5 Pro ने उन्हें और उनकी लैब को तीन साल पुरानी एक पहेली पर फिर से काम करने में मदद की, यह पहेली एक खास तरह के इम्यून सेल के बारे में थी. जो कैंसर और दूसरी बीमारियों से लड़ने में इंसानी शरीर की मदद करता है.
यह पहेली इम्यूनोलॉजी के एक बुनियादी लेकिन अहम सवाल के बारे में थी: ग्लूकोज़ 'टी सेल' के विकसित होने और कुछ सीखने के तरीके पर कैसे असर डालता है? 'टी सेल' ऐसे इम्यून सेल हैं जो शरीर को वायरस से लड़ने, कैंसरग्रस्त सेल को मारने, कुछ बैक्टीरिया और पैरासाइट का सामना करने, और उसे यह पहचानने में मदद करती है कि कौन-से सेल हेल्दी हैं और कौन-से शरीर के लिए खतरा हैं. जैसे-जैस वे विकसित होते हैं, अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ अपना लेते हैं, जिनमें कैंसर, ऑटोइम्यून बीमारी और इन्फ़ेक्शन जैसी चीज़ों को आकार देने वाले काम भी हैं. यह समझना कि 'टी सेल' एक से दूसरे काम की ओर क्यों बढ़ते हैं, रिसर्चर्स को इन बीमारियों को बेहतर समझने और आगे चलकर उनका बेहतर इलाज करने में मदद कर सकता है.
आज उनुतमाज़—द जैक्सन लेबोरेटरी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ कनेक्टिकट में प्रोफ़ेसर हैं—वे कहते हैं कि AI उनके काम का इतना ज़रूरी हिस्सा बन गया है कि इसके बिना अब वे विज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकते. उन्होंने कहा, "यह ऐसा होगा मानो आपके दोनों हाथ छीन लिए जाएँ, या आपका आधा दिमाग निकाल लिया जाए."
यह पहेली 2022 में शुरू हुई, जब उनुतमाज़ ने यह समझने के लिए एक प्रयोग किया कि ग्लूकोज़ नाम का एक शुगर 'टी सेल' के विकास पर कैसे असर डालता है. ये सेल ग्लूकोज़ का इस्तेमाल ईंधन के एक सोर्स की तरह तो करते हैं, लेकिन साथ ही प्रोटीन बनाने और अन्य कामों के लिए भी करते हैं.
उनुतमाज़ के इस प्रयोग के नतीजों से कैंसर, ऑटोइम्यून बीमारी और इन्फ़ेक्शन जैसी बीमारियों के इलाज में बड़े बदलाव आ सकते थे. लेकिन उस समय उनुतमाज़ और उनकी लैब उन नतीजों को समझ नहीं पा रही थी.
पिछली स्टडीज़ ने इस बात के साफ़ सबूत दिए थे कि ग्लूकोज़ का मेटाबॉलिज़्म 'टी सेल' की स्पेशलाइज़ेशन पर असर डालता है. इस रिश्ते को अच्छे से समझने के लिए उनुतमाज़ और उनकी टीम ने 'टी सेल' को उसके शुरुआती डेवलपमेंट के समय या तो कम ग्लूकोज़ वाले माहौल में रखा या ऐसे माहौल में जिसमें डिऑक्सीग्लूकोज़ नाम का ग्लूकोज़ जैसा मॉलिक्यूल था. सेल की ग्लूकोज़ का इस्तेमाल करने की क्षमता में डिऑक्सीग्लूकोज़ रुकावटें डालता है, जिससे एनर्जी और प्रोटीन के बनने में दिक्कतें आती हैं. प्रोटीन इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि वे सेल के अंदर के कामकाज को संभालते हैं और जानकारियों को सेल के अंदर और बाहर लाने और भेजने वाले मैसेंजर का काम करते हैं.
टीम को उम्मीद थी कि दोनों स्थितियों से एक-जैसे नतीजे मिलेंगे, क्योंकि दोनों ही मामलों में ग्लूकोज़ यानी 'टी सेल' को मिलने वाली ज़रूरी एनर्जी सीमित होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
डिऑक्सीग्लूकोज़ के संपर्क में आई 'टी सेल' ने बहुत बड़ी तादाद में ऐसे सेल बनाए जो शरीर की सूजन से जुड़े रिस्पॉन्स में शामिल होते हैं. कम ग्लूकोज़ वाले माहौल में रखे गए कुछ 'टी सेल' ने सूजन पर काम करने के मामले में महारत हासिल की, लेकिन उनकी संख्या डिऑक्सीग्लूकोज़ वाले 'टी सेल' जितनी नहीं थी. रिसर्चरों ने जब ग्लूकोज़ जैसे मॉलिक्यूल को हटा दिया, तब भी डिऑक्सीग्लूकोज़ के शुरुआती संपर्क का असर बना रहा.
इस फ़र्क को सिर्फ़ एनर्जी की कमी से नहीं समझाया जा सकता था. कुछ और हो रहा था. लेकिन उनुतमाज़ और उनकी लैब यह समझ नहीं पा रही थी कि क्या हो रहा था, इसलिए उन्होंने प्रयोग को ठंडे बस्ते में डाल दिया और कुछ ऐसे दूसरे कामों में लग गए जो ज़्यादा ज़रूरी थे.
फिर 2025 के आखिर में GPT‑5 Pro आया और उनुतमाज़ ने उस प्रयोग को दोबारा सामने लाने का फ़ैसला किया. उन्होंने नतीजों को मॉडल में अपलोड किया और उससे डेटा को एनालाइज़ करने को कहा.
GPT‑5 Pro ने बताया कि डिऑक्सीग्लूकोज़ ने IL-2 नाम के प्रोटीन के बनने में रुकावटें पैदा की हैं. यह प्रोटीन 'टी सेल' को सूजन से जुड़े रिस्पॉन्स सेल Th17 बनने से रोक सकता है. असल में डिऑक्सीग्लूकोज़ ने 'टी सेल' के Th17 सेल बनने के रास्ते की रुकावट हटा दी. शायद इसीलिए कम ग्लूकोज़ वाले माहौल में 'टी सेल' उतनी बड़ी तादाद में Th17 सेल नहीं बना सकें, जितने डिऑक्सीग्लूकोज़ वाले माहौल में बने.
उनुतमाज़ ने कहा, "GPT‑5 ने यह बेहद कमाल की जानकारी दी, जो पीछे पलटकर देखने पर पूरी तरह से समझ में आती है." यह बात उनकी अपनी विशेषज्ञता के दायरे से थोड़ी बाहर थी, इसलिए इस कनेक्शन को वे खुद नहीं समझ पाए और न ही उनकी लैब में कोई इसे देख पाया.
इसके बाद उनुतमाज़ ने यह देखने का फ़ैसला किया कि क्या GPT‑5 किसी प्रयोग के नतीजे का अनुमान भी लगा सकता है. इम्यूनोलॉजिस्ट ने शुरुआत उस प्रयोग से की जिसे वे पहले ही एक तरह के लिम्फोमा को निशाना बनाने वाली 'टी सेल' पर कर चुके थे. उनके प्रयोग से पता चला कि CD8+ कहलाने वाली इन खास 'टी सेल' में लिम्फोमा सेल को मारने की क्षमता बढ़ी हुई थी.
जब उनुतमाज़ ने GPT‑5 Pro से वही प्रयोग सिम्युलेट करने को कहा, तो उसने CD8+ सेल की लिम्फोमा सेल को मारने की क्षमता में बढ़ोतरी का सही अनुमान लगाया. यह संभव नहीं था कि मॉडल ने ये नतीजे इंटरनेट से लिए हों, क्योंकि तब तक उनुतमाज़ ने नतीजे रिलीज़ ही नहीं किए थे.
उन्होंने कहा, "यह वह पल था जब मुझे लगा कि ठीक है, ये मॉडल अब उस मुकाम पर पहुँच गए हैं जहाँ वे सचमुच, वाकई में समझते हैं."
उनुतमाज़ का कहना है कि GPT‑5 Pro जैसे मॉडल अब सहयोगियों की तरह ज़्यादा काम करते हैं. वे लिटरेचर रिव्यू के काम को आसान बना सकते हैं, हर हफ़्ते पब्लिश होने वाले सैकड़ों नए एकेडमिक रिसर्च पेपर को प्रोसेस कर सकते हैं और वैज्ञानिकों को ऐसे सवाल पहचानने में मदद कर सकते हैं जिनके जवाब अभी बाकी हैं. वे अपनी हाइपोथिसिस को और बेहतर बनाने में भी रिसर्चरों की मदद कर सकते हैं, जिससे यह तय करने में कम समय लगता है कि कौन से प्रयोग करना सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद रहेगा.
उनुतमाज़ का कहना है, "अपनी हाइपोथिसिस पर काम करने के लिए आप बहुत सारी चीज़ें कर सकते हैं. आपके पास अनगिनत तरीके होते हैं और आपको पता नहीं होता कि इनमें सबसे अच्छी स्ट्रैटेजी कौन-सी होगी." इसलिए वे GPT‑5 Pro का इस्तेमाल प्रयोगों को सिम्युलेट करने और नतीजों का अनुमान लगाने के लिए करते हैं, ताकि यह तय करने में मदद मिले कि लैब में कौन-से प्रयोग दोहराए जा सकते हैं. इससे रिसर्चरों के लिए हफ़्तों से लेकर महीनों, यहाँ तक कि सालों का काम बच सकता है और बायोलॉजी का क्षेत्र बहुत तेज़ी से आगे बढ़ सकता है.
इसके बावजूद, विषयों की गहरी समझ अब भी अहमियत रखती है. AI इनसाइट दे सकती है, लेकिन लोगों को उसकी अहमियत और सच्चाई को खुद ही परखना होगा. मिसाल के तौर पर, अगर कोई उनुतमाज़ की तरह एक्सपर्ट न हो, तो वह यह समझ ही नहीं सकता कि 'टी सेल' के प्रयोग में GPT‑5 Pro ने जो मशीनी इनसाइट दी थी, उसका कोई मतलब भी था या नहीं.
इनसाइट देने और काम को तेज़ करने की क्षमता ही वे कारण हैं कि इन मॉडलों को ज़िम्मेदारी के साथ संभालना ज़रूरी है. AI बायोलॉजी और मेडिसिन में रिसर्चरों को तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद कर सकती है, लेकिन ये क्षमताएँ गलत इस्तेमाल करने वालों की राह भी आसान कर सकती हैं, जिनमें जैविक या रासायनिक हथियार बनाने या इस्तेमाल करने की कोशिश करने वाले लोग भी शामिल हैं. OpenAI का प्रिपेयर्डनेस फ़्रेमवर्क इन जोखिमों पर नज़र रखने और AI की वैसी क्षमताएँ जिनसे गंभीर नुकसान हो सकता है, उनके खिलाफ़ सुरक्षा कवच बनाने के हमारे तरीके को साफ़ तौर पर दिखाता है.
AI के आगे के सफ़र को लेकर उनुतमाज़ को काफ़ी उम्मीदें हैं. वे कहते हैं कि यह पहले आई किसी भी चीज़ जैसा नहीं है—न इंटरनेट जैसा और न इंडस्ट्रियल क्रांति जैसा. हाल ही में, उनुतमाज़ ने Codex और GPT‑5.2 डीप रिसर्च सहित एडवांस AI टूल के साथ प्रयोग किए हैं, ताकि बड़े पैमाने के कैंसर म्यूटेशन डेटासेट तैयार करने और रिसर्च मटेरियल बनाने में मदद मिल सके—इसमें प्रिसिज़न इम्यूनोथेरेपी की कोशिशों को तेज़ करने के लिए—'टी-सेल' पर आधारित एक पूरी ड्राफ़्ट टेक्स्टबुक भी शामिल है.
उनुतमाज़ खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि वे डिस्कवरी के इस दौर का हिस्सा हैं. "इसे इतिहास बनते हुए देखना ही नहीं, बल्कि इसमें थोड़ा हिस्सा भी लेना, मेरे लिए वाकई बहुत बड़ी क़िस्मत और गर्व की बात है."
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